घमंड का पुतला

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शाम हो गयी थी। मैं सरयू नदी के किनारे अपने कैम्प में बैठा हुआ नदी के मज़े ले रहा था कि मेरे फ़ुटबाल ने दबे पांव पास आकर मुझे सलाम किया कि जैसे वह मुझसे कुछ कहना चाहता है। फ़ुटबाल के नाम से जिस प्राणी का ज़िक्र किया गया वह मेरा अर्दली था। उसे सिर्फ़ एक नज़र देखने से यक़ीन हो जाता था कि यह नाम उसके लिए पूरी तरह उचित है। वह सिर से पैर तक आदमी की शक्ल में एक गेंद था। लम्बाई-चौड़ाई बराबर। उसका भारी-भरकम पेट, जिसने उस दायरे के बनाने में ख़ास हिस्सा लिया था, एक लम्बे कमरबन्द में लिपटा रहता था, शायद इसलिए कि वह इन्तहा से आगे न बढ़ जाए। जिस वक़्त वह तेज़ी से चलता था बल्कि यों कहिए लुढ़कता था तो साफ़ मालूम होता था कि कोई फ़ुटबाल ठोकर खाकर लुढ़कता चला आता है।
मैंने उसकी तरफ़ देखकर पूछा- क्या कहते हो?
इस पर फ़ुटबाल ने ऐसी रोनी सूरत बनायी कि जैसे कहीं से पिटकर आया है और बोला-हुज़ूर, अभी तक यहां रसद का कोई इन्तज़ाम नहीं हुआ। ज़मींदार साहब कहते हैं कि मैं किसी का नौकर नहीं हूँ।
मैने इस निगाह से देखा कि जैसे मैं और ज़्यादा नहीं सुनना चाहता। यह असम्भव था कि मजिस्ट्रेट की शान में ज़मींदार से ऐसी गुस्ताख़ी होती। यह मेरे हाकिमाना ग़ुस्से को भड़काने की एक बदतमीज़ कोशिश थी।
मैंने पूछा, ज़मीदार कौन है?
फ़ुटबाल की बांछें खिल गयीं, बोला-क्या कहूँ, कुंअर सज्जनसिंह। हुज़ूर, बड़ा ढीठ आदमी है। रात आयी है और अभी तक हुज़ूर के सलाम को भी नहीं आया। घोड़ों के सामने न घास है न दाना। लश्कर के सब आदमी भूखे बैठे हुए हैं। मिट्टी का एक बर्तन भी नहीं भेजा।
मुझे ज़मींदारों से रात-दिन साबका रहता था मगर यह शिकायत कभी सुनने में नहीं आयी थी। इसके विपरीत वह मेरी ख़ातिर-तवाज़ों में ऐसी जाफिशानी से काम लेते थे जो उनके स्वाभिमान के लिए ठीक न थी। उसमें दिल खोलकर आतिथ्य-सत्कार करने का भाव तनिक भी न होता था। न उसमें शिष्टाचार था, न वैभव का प्रदर्शन जो ऐब है। इसके बजाय वहां बेजा रसूख़ की फ़िक्र और स्वार्थ की हवस साफ़ दिखायी देती भी और इस रसूख़ बनाने की क़ीमत काव्योचित अतिशयोक्ति के साथ ग़रीबों से वसूल की जाती थी, जिनका बेकसी के सिवा और कोई हाथ पकड़ने वाला नहीं। उनके बात करने के ढंग में वह मुलामियत और आजिज़ी बरती जाती थी जिसका स्वाभिमान से बैर है और अक्सर ऐसे मौक़े आते थे, जब इन ख़ातिरदारियों से तंग होकर दिल चाहता था कि काश इन ख़ुशामदी आदमियों की सूरत न देखनी पड़ती। मगर आज फ़ुटबाल की ज़बान से यह कैफियत सुनकर मेरी जो हालत हुई उसने साबित कर दिया कि रोज़-रोज़ की ख़ातिरदारियों और मीठी-मीठी बातों ने मुझ पर असर किये बिना नहीं छोड़ा था। मैं यह हुक्म देनेवाला ही था कि कुंअर सज्जन सिंह को हाज़िर करो कि एकाएक मुझे ख़याल आया कि इन मुफ़्तखोर चपरासियों के कहने पर एक प्रतिष्ठित आदमी को अपमानित करना न्याय नहीं है।
मैंने अर्दली से कहा – बनियों के पास जाओ, नक़द दाम देकर चीज़ें लाओ और याद रखो कि मेरे पास कोई शिकायत न आये।
अर्दली दिल में मुझे कोसता हुआ चला गया। मगर मेरे आश्चर्य की कोई सीमा न रही, जब वहां एक हफ़्ते तक रहने पर भी कुंअर साहब से मेरी भेंट न हुई। अपने आदमियों और लश्करवालों की ज़बान से कुंअर साहब की ढिठाई, घमण्ड और हेकड़ी की कहानियां रोज़ सुना करता। और मेरे दुनिया देखे हुए पेशकार ने ऐसे अतिथि-सत्कार-शून्य गांव में पड़ाव डालने के लिए मुझे कई बार इशारों से समझाने-बुझाने की कोशिश की। ग़ालिबन मैं पहला आदमी था जिससे यह भूल हुई थी और अगर मैंने ज़िले के नक्शे के बदले लश्करवालों से अपने दौरे का प्रोग्राम बनाने में मदद ली होती तो शायद इस अप्रिय अनुभव की नौबत न आती। लेकिन कुछ अजब बात थी कि कुंअर साहब को बुरा-भला कहना मुझ पर उल्टा असर डालता था। यहाँ तक कि मुझे उस अदमी से मुलाक़ात करने की इच्छा पैदा हुई जो सर्वशक्तिमान् अफ़सरों से इतना ज़्यादा अलग-थलग रह सकता है।
2
सुबह का वक़्त था, मैं गढ़ी में गया। नीचे सरयू नदी लहरें मार रही थी। उस पार साखू का जंगल था। मीलों तक बादामी रेत, उस पर खरबूज और तरबूज की क्यारियाँ थीं। पीले-पीले फूलों-से लहराती हुई बगुलों और मुर्गाबियों के गोल-के-गोल बैठे हुए थे! सूर्य देवता ने जंगलों से सिर निकाला, लहरें जगमगायीं, पानी में तारे निकले। बड़ा सुहाना, आत्मिक उल्लास देनेवाला दृश्य था। मैंने ख़बर करवायी और कुंअर साहब के दीवानखाने में दाख़िल हुआ, लम्बा-चौड़ा कमरा था। फ़र्श बिछा हुआ था। सामने मसनद पर एक बहुत लम्बा-तड़ंगा आदमी बैठा था। सर के बाल मुड़े हुए, गले में रुद्राक्ष की माला, लाल-लाल, ऊंचा माथा-पुरुषोचित अभिमान की इससे अच्छी तस्वीर नहीं हो सकती। चेहरे से रोबदाब बरसता था। कुअंर साहब ने मेरे सलाम को इस अन्दाज़़ से लिया कि जैसे वह इसके आदी हैं। मसनद से उठकर उन्होंने बहुत बड़प्पन के ढंग से मेरी अगवानी की, ख़ैरियत पूछी, और इस तकलीफ़ के लिए मेरा शुक्रिया अदा करने के बाद इतर और पान से मेरी तवाज़ो की। तब वह मुझे अपनी उस गढ़ी की सैर कराने चले जिसने किसी ज़माने में ज़रूर आसफुद्दौला को जिच किया होगा मगर इस वक़्त बहुत टूटी-फूटी हालत में थी। यहां के एक-एक रोड़े पर कुंअर साहब को नाज़ था। उनके ख़ानदानी बड़प्पन ओर रोबदाब का ज़िक्र उनकी ज़बान से सुनकर विश्वास न करना असम्भव था। बयान करने का ढंग यक़ीन को मज़बूत करता था और वे उन कहानियों के सिर्फ़ पासबान ही न थे बल्कि वह उनके ईमान का हिस्सा थीं। और जहां तक उनकी शक्ति में था, उन्होंने अपनी आन निभाने में कभी कसर नहीं की। कुंअर सज्जनसिंह ख़ानदानी रईस थे। उनकी वंश-परंपरा यहां-वहां टूटती हुई अन्त में किसी महात्मा ऋषि से जाकर मिल जाती थी। उन्हें तपस्या और भक्ति और योग का कोई दावा न था लेकिन इसका गर्व उन्हें अवश्य था कि वे एक ऋषि की सन्तान हैं। पुरखों के जंगली कारनामे भी उनके लिए गर्व का कुछ कम कारण न थे। इतिहास में उनका कहीं ज़िक्र न हो मगकर ख़ानदानी भाट ने उन्हें अमर बनाने में कोई कसर न रखी थी और अगर शब्दों में कुछ ताकत है तो यह गढ़ी रोहतास या कालिंजर के किलों से आगे बढ़ी हुई थी। कम-से-कम प्राचीनता और बर्बादी के बाह्म लक्षणों में तो उसकी मिसाल मुश्किल से मिल सकती थी, क्योंकि पुराने ज़माने में चाहे उसने मुहासरों और सुरंगों को हेच समझा हो लेकिन वक़्त वह चीटियों और दीमकों के हमलों का भी सामना न कर सकती थी। कुंअर सज्जनसिंह से मेरी भेंट बहुत संक्षिप्त थी लेकिन इस दिलचस्प आदमी ने मुझे हमेशा के लिए अपना भक्त बना लिया। बड़ा समझदार, मामले को समझनेवाला, दूरदर्शी आदमी था। आख़िर मुझे उसका बिन पैसों का ग़ुलाम बनना था।
3
बरसात में सरयू नदी इस ज़ोर-शोर से चढ़ी कि हज़ारों गांव बरबाद हो गए, बड़े-बड़े तनावर दरख्त़ तिनकों की तरह बहते चले जाते थे। चारपाइयों पर सोते हुए बच्चे-औरतें, खूंटों पर बंधे हुए गाय और बैल उसकी गरजती हुई लहरों में समा गए। खेतों में नाव चलती थी। शहर में उड़ती हुई ख़बरें पहुंचीं। सहायता के प्रस्ताव पास हुए। सैकड़ों ने सहानुभूति और शोक के अरजेण्ट तार ज़िले के बड़े साहब की सेवा में भेजे। टाउनहाल में क़ौमी हमदर्दी की पुरशोर सदाएं उठीं और उस हंगामे में बाढ़-पीड़ितों की दर्दभरी पुकारें दब गयीं। सरकार के कानों में फरियाद पहुँची। एक जांच कमीशन तैयार किया गया। ज़मींदारों को हुक्म हुआ कि वे कमीशन के सामने अपने नुकसानों को विस्तार से बतायें और उसके सबूत दें। शिवरामपुर के महाराजा साहब को इस कमीशन का सभापति बनाया गया। ज़मींदारों में रेल-पेल शुरू हुई। नसीब जागे। नुकसान के तखमीन का फैलला करने में काव्य-बुद्धि से काम लेना पड़ा। सुबह से शाम तक कमीशन के सामने एक जमघट रहता। आनरेबुल महाराजा साहब को सांस लेने की फ़ुरसत न थी दलील और शाहदत का काम बात बनाने और ख़ुशामद से लिया जाता था। महीनों यही कैफियत रही। नदी किनारे के सभी ज़मींदार अपने नुकसान की फरियादें पेश कर गए, अगर कमीशन से किसी को कोई फायदा नहीं पहुँचा तो वह कुंअर सज्जनसिहं थे। उनके सारे मौजे सरयू के किनारे पर थे और सब तबाह हो गए थे, गढ़ी की दीवारें भी उसके हमलों से न बच सकी थीं, मगर उनकी ज़बान ने ख़ुशामद करना सीखा ही न था और यहां उसके बग़ैर रसाई मुश्किल थी। चुनांचे वह कमीशन के सामने न आ सके। मियाद खतम होने पर कमीशन ने रिपोर्ट पेश की, बाढ़ में डूबे हुए इलाकों में लगान की आम माफी हो गयी। रिपोर्ट के मुताबिक़ सिर्फ़ सज्जनसिंह वह भाग्यशाली ज़मींदार थे। जिनका कोई नुकसान नहीं हुआ था। कुंअर साहब ने रिपोर्ट सुनी, मगर माथे पर बल न आया। उनके आसामी गढ़ी के सहन में जमा थे, यह हुक्म सुना तो रोने-धोने लगे।
तब कुंअर साहब उठे और बुलन्द आवाज़़ में बोले-मेरे इलाक़े में भी माफी है। एक कौड़ी लगान न लिया जाए।
मैंने यह वाकया सुना और ख़ुद ब ख़ुद मेरी आंखों से आंसू टपक पड़े बेशक यह वह आदमी है जो हुकूमत और अख़्तियार के तूफ़ान में जड़ से उखड़ जाय मगर झुकेगा नहीं।
4
वह दिन भी याद रहेगा जब अयोध्या में हमारे जादू-सा करने वाले कवि शंकर को राष्ट्र की ओर से बधाई देने के लिए शानदार जलसा हुआ। हमारा गौरव, हमारा जोशीला शंकर योरोप और अमरीका पर अपने काव्य का जादू करके वापस आया था अपने कमालों पर घमण्ड करनेवाले योरोप ने उसकी पूजा की थी। उसकी भावनाओं ने ब्राउनिंग और शैली के प्रेमियों को भी अपनी वफ़ा का पाबन्द न रहने दिया। उसकी जीवन-सुधा से योरोप के प्यासे जी उठे। सारे सभ्य संसार ने उसकी कल्पना की उड़ान के आगे सिर झुका दिये। उसने भारत को योरोप की निगाहों में अगर ज़्यादा नहीं तो यूनान और रोम के पहलू में बिठा दिया था। जब तक वह योरोप में रहा, दैनिक अख़बारों के पन्ने उसकी चर्चा से भरे रहते थे। यूनिवर्सिटियों और विद्वानों की सभाओं ने उस पर उपाधियों की मूसलाधार वर्षा कर दी। सम्मान का वह पदक जो योरोपवालों का प्यारा सपना और ज़िन्दा आरज़ू है, वह पदक हमारे ज़िन्दादिल शंकर के सीने पर शोभा दे रहा था और उसकी वापसी के बाद उन्हीं राष्ट्रीय भावनाओं के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए हिन्दोस्तान के दिल और दिमाग़ अयोध्या में जमा थे। इसी अयोध्या की गोद में श्री रामचंद्र खेलते थे और यहीं उन्होंने वाल्मीकि की जादू-भरी लेखनी की प्रशंसा की थी। उसी अयोध्या में हम अपने मीठे कवि शंकर पर अपनी मुहब्बत के फूल चढ़ाने आये थे। इस राष्ट्रीय कतैव्य में सरकारी हुक़्क़ाम भी बड़ी उदारतापूर्वक हमारे साथ सम्मिलित थे। शंकर ने शिमला और दार्जिलिंग के फ़रिश्तों को भी अयोध्या में खींच लिया था। अयोध्या को बहुत इन्तज़ार के बाद यह दिन देखना नसीब हुआ। जिस वक़्त शंकर ने उस विराट पण्डाल में पैर रखा, हमारे हृदय राष्ट्रीय गौरव और नशे से मतवाले हो गये। ऐसा महसूस होता था कि हम उस वक़्त किसी अधिक पवित्र, अधिक प्रकाशवान दुनिया के बसनेवाले हैं। एक क्षण के लिए-अफ़सोस है कि सिर्फ़ एक क्षण के लिए-अपनी गिरावट और बर्बादी का ख़याल हमारे दिलों से दूर हो गया। जय-जय की आवाज़़ों ने हमें इस तरह मस्त कर दिया जैसे महुअर नाग को मस्त कर देता है। एड्रेस पढ़ने का गौरव मुझको प्राप्त हुआ था। सारे पण्डाल में ख़ामोशी छायी हुई थी। जिस वक़्त मेरी ज़बान से यह शब्द निकले-ऐ राष्ट्र के नेता! ऐ हमारे आत्मिक गुरू! हम सच्ची मुहब्बत से तुम्हें बधाई देते हैं और सच्ची श्रद्धा से तुम्हारे पैरों पर सिर झुकाते हैं…यकायक मेरी निगाह उठी और मैंने एक हृष्ट-पुष्ट हैकल आदमी को ताल्लुकेदारों की कतार से उठकर बाहर जाते देखा। यह कुंअर सज्जन सिंह थे। मुझे कुंअर साहब की यह बेमौक़ा हरकत, जिसे अशिष्टता समझने में कोई बाधा नहीं है, बुरी मालूम हुई। हज़ारों आंखें उनकी तरफ़ हैरत से उठीं। जलसे के ख़त्म होते ही मैंने पहला काम जो किया वह कुंअर साहब से इस चीज़ के बारे में जवाब तलब करना था। मैंने पूछा – क्यों साहब आपके पास इस बेमौक़ा हरकत का क्या जवाब है?
सज्जनसिंह ने गम्भीरता से जवाब दिया-आप सुनना चाहें तो जवाब दूँ।
‘शौक़ से फरमाइये
”अच्छा तो सुनिये। मैं शंकर की कविता का प्रेमी हूँ। शंकर की इज़्ज़त करता हूँ, शंकर पर गर्व करता हूँ, शंकर को अपने और अपनी क़ौम के ऊपर एहसान करनेवाला समझता हूँ मगर उसके साथ ही उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु मानने या उनके चरणों में सिर झुकाने के लिए तैयार नहीं हूँ। मैं
आश्चर्य से उसका मुंह ताकता रह गया। यह आदमी नहीं, घमण्ड का पुतला हैं देखें यह सिर कभी झुकता या नहीं।
5
पूरनमासी का पूरा चांद सरयू के सुनहरे फर्श पर नाचता था और लहरें ख़ुशी से गले मिल-मिलकर गाती थीं। फागुन का महीना था, पेड़ों में कोपलें निकली थीं और कोयल कूकने लगी थी। मैं अपना दौरा करके सदर लौटता था। रास्ते में कुंअर सज्जनसिंह से मिलने का चाव मुझे उनके घर तक ले गया, जहां अब मैं बड़ी बेतकल्लुफी से जाता-आता था। मैं शाम के वक़्त नदी की सैर को चला। वह प्राणदायिनी हवा, वह उड़ती हुई लहरें, वह गहरी निस्तबधता-सारा दृश्य एक आकर्षक सुहाना सपना था। चांद के चमकते हुए गीत से जिस तरह लहरें झूम रही थीं, उसी तरह मीठी चिन्ताओं से दिल उमड़ा आता था। मुझे ऊंचे कगार पर एक पेड़ के नीचे कुछ रोशनी दिखायी दी। मैं ऊपर चढ़ा। वहां बरगद की घनी छाया में धूनी जल रही थी। उसके सामने एक साधू पैर फैलाये बरगद की एक मोटी जटा के सहारे लेटे हुए थे। उनका चमकता हुआ चेहरा आग की चमक को लजाता था। नीले तालाब में कमल खिला हुआ था। उनके पैरों के पास एक दूसरा आदमी बैठा हुआ था। उसकी पीठ मेरी तरफ़ थी। वह उस साधू के पेरों पर अपना सिर रखे हुए था। पैरों को चूमता था और आंखों से लगाता था। साधू अपने दोनों हाथ उसके सिर पर रखे हुए थे कि जैसे वासना धैर्य और संतोष के आंचल में आश्रय ढूंढ़ रही हो। भोला लड़का मां-बाप की गोद में आ बैठा था। एकाएक वह झुका हुआ सर उठा और मेरी निगाह उसके चेहरे पर पड़ी। मुझे सकता-सा हो गया। यह कुंअर सज्जनसिंह थे। वह सर जो झुकना न जानता था, इस वक़्त ज़मीन छू रहा था। वह माथा जो एक ऊंचे मंसबदार के सामने न झुका, जो एक प्रतानी वैभवशाली महाराज के सामने न झुका, जो एक बड़े देशप्रेमी कवि और दार्शनिक के सामने न झूका, इस वक़्त एक साधु के क़दमों पर गिरा हुआ था। घमण्ड, वैराग्य के सामने सिर झुकाये खड़ा था। मेरे दिल में इस दृश्य से भक्ति का एक आवेग पैदा हुआ। आंखों के सामने से एक परदा-सा हटा और कुंअर सज्जन सिंह का आत्मिक स्तर दिखायी दिया। मैं कुंअर साहब की तरफ़ से लिपट गया और बोला-मेरे दोस्त, मैं आज तक तुम्हारी आत्मा के बड़प्पन से बिल्कुल बेख़बर था। आज तुमने मेरे हृदय पर उसको अंकित कर दिया कि वैभव और प्रताप, कमाल और शोहरत यह सब घटिया चीज़ें हैं, भौतिक चीज़ें हैं। वासनाओ में लिपटे हुए लोग इस योग्य नहीं कि हम उनके सामने भक्ति से सिर झुकायें, वैराग्य और परमात्मा से दिल लगाना ही वे महान् गुण हैं जिनकी ड्यौढ़ी पर बड़े-बड़े वैभवशाली और प्रतापी लोगों के सिर भी झुक जाते हैं। यही वह ताकत है जो वैभव और प्रताप को, घमण्ड की शराब के मतवालों को और जड़ाऊ मुकुट को अपने पैरों पर गिरा सकती है। ऐ तपस्या के एकान्त में बैठनेवाली आत्माओ! तुम धन्य हो कि घमण्ड के पुतले भी पैरों की धूल को माथे पर चढ़ाते हैं। कुंअर सज्जनसिंह ने मुझे छाती से लगाकर कहा-मिस्टर वागले, आज आपने मुझे सच्चे गर्व का रूप दिखा दिया और में कह सकता हूँ कि सच्चा गर्व सच्ची प्रार्थना से कम नहीं। विश्वास मानिये मुझे इस वक़्त ऐसा मालूम होता है कि गर्व में भी आत्मिकता को पाया जा सकता है। आज मेरे सिर में गर्व का जो नशा है, वह कभी नहीं था।

By |2019-04-29T15:36:33+05:30April 29th, 2019|Hindi Stories, Premchand's Other Stories, Stories of Premchand|0 Comments

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