मंदिर और मस्जिद

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चौधरी इतरत अली ‘कड़े’ के बड़े जागीरदार थे। उनके बुज़ुर्गो ने शाही ज़माने में अंग्रेज़ी सरकार की बड़ी-बड़ी ख़िदमत की थीं। उनके बदले में यह जागीर मिली थी। अपने सुप्रबन्धन से उन्होंने अपनी मिल्कियत और भी बढ़ा ली थी और अब इस इलाक़े में उनसे ज़्यादा धनी-मानी कोई आदमी न था। अंग्रेज़ हुक़्क़ाम जब इलाक़े में दौरा करने जाते तो चौधरी साहब की मिज़ाजपुर्सी के लिए ज़रूर आते थे। मगर चौधरी साहब ख़ुद किसी हाकिम को सलाम करने न जाते, चाहे वह कमिश्नर ही क्यों न हो। उन्होंने कचहरियों में न जाने का व्रत-सा कर लिया था। किसी इजलास-दरबार में भी न जाते थे। किसी हाकिम के सामने हाथ बांधकर खड़ा होना और उसकी हर एक बात पर ‘जी हुज़ूर’ करना अपनी शान के ख़िलाफ़ समझते थे। वह यथासाध्य किसी मामले-मुक़दमे में न पड़ते थे, चाहे अपना नुकसान ही क्यों न होता हो। यह काम सोलहों आने मुख़्तारों के हाथ में था, वे एक के सौ करें या सौ के एक। फ़ारसी और अरबी के आलिम थे, शरा के बड़े पाबंद, सूद को हराम समझते, पांचों वक़्त की नमाज़ अदा करते, तीसों रोज़े रखते और नित्य क़ुरान की तलावत (पाठ) करते थे। मगर धार्मिक संकीर्णता कहीं छू तक नहीं गयी थी। प्रात:काल गंगा-स्नान करना उनका नित्य का नियम था। पानी बरसे, पाला पड़े, पर पांच बजे वह कोस-भर चलकर गंगा तट पर अवश्य पहुंच जाते। लौटते वक़्त अपनी चांदी की सुराही गंगाजल से भर लेते और हमेशा गंगाजल पीते। गंगाजी के सिवा वह और कोई पानी पीते ही न थे। शायद कोई योगी-यती भी गंगाजल पर इतनी श्रद्धा न रखता होगा। उनका सारा घर, भीतर से बाहर तक, सातवें दिन गऊ के गोबर से लीपा जाता था। इतना ही नही, उनके यहां बग़ीचे में एक पण्डित बारहों मास दुर्गा पाठ भी किया करते थे। साधु-संन्यासियों का आदर-सत्कार तो उनके यहां जितनी उदारता और भक्ति से किया जाता था, उस पर राजों को भी आश्चर्य होता था। यों कहिए कि सदाव्रत चलता था। उधर मुसलमान फ़क़ीरों का ख़ाना बावर्चीखाने में पकता था और कोई सौ-सवा सौ आदमी नित्य एक दस्तरख़ान पर खाते थे। इतना दान-पुण्य करने पर भी उन पर किसी महाजन का एक कौड़ी का भी क़र्ज़ न था। नीयत की कुछ ऐसी बरकत थी कि दिन-दिन उन्नति ही होती थी। उनकी रियासत में आम हुक्म था कि मुर्दो को जलाने के लिए, किसी यज्ञ या भोज के लिए, शादी-ब्याह के लिए सरकारी जंगल से जितनी लकड़ी चाहे काट लो, चौधरी साहब से पूछने की ज़रूरत न थी। हिंदू असामियों की बारात में उनकी ओर से कोई न कोई ज़रूर शरीक होता था। नवेद के रुपये बंधे हुए थे, लड़कियों के विवाह में कन्यादान के रुपये मुक़र्रर थे, उनको हाथी, घोड़े, तंबू, शामियाने, पालकी-नालकी, फर्श-जाजिमें, पंखे-चंवर, चांदी के महफ़िली सामान उनके यहां से बिना किसी दिक़्क़त के मिल जाते थे, मांगने-भर की देर रहती थी। इस दानी, उदार, यशस्वी आदमी के लिए प्रजा भी प्राण देने को तैयार रहती थी।

चौधरी साहब के पास एक राजपूत चपरासी था भजनसिंह। पूरे छ: फ़ुट का जवान था, चौड़ा सीना, बाने का लठैत, सैकड़ों के बीच से मारकर निकल आने वाला। उसे भय तो छू भी नहीं गया था। चौधरी साहब को उस पर असीम विश्वास था, यहां तक कि हज करने गये तो उसे भी साथ लेते गये थे। उनके दुश्मनों की कमी न थी, आस-पास के सभी ज़मींदार उनकी शक्ति और कीर्ति से जलते थे। चौधरी साहब के ख़ौफ़ के मारे वे अपने असामियों पर मनमाना अत्याचार न कर सकते थे, क्योंकि वह निर्बलों का पक्ष लेने के लिए सदा तैयार रहते थे। लेकिन भजनसिंह साथ हो, तो उन्हें दुश्मन के द्वार पर भी सोने में कोई शंका न थी। कई बार ऐसा हुआ कि दुश्मनों ने उन्हें घेर लिया और भजनसिंह अकेला जान पर खेलकर उन्हें बेदाग़ निकाल लाया। ऐसा आग में कूद पड़ने वाला आदमी भी किसी ने कम देखा होगा। वह कहीं बाहर जाता तो जब तक ख़ैरियत से घर न पहुंच जाय, चौधरी साहब को शंका बनी रहती थी कि कहीं किसी से लड़ न बैठा हो। बस, पालतू भेड़े की-सी दशा थी, जो ज़ंजीर से छुटते ही किसी न किसी से टक्कर लेने दौड़ता है। तीनों लोक में चौधरी साहब के सिवा उसकी निगाहों में और कोई था ही नही। बादशाह कहो, मालिक कहो, देवता कहो, जो कुछ थे चौधरी साहब थे।
मुसलमान लोग चौधरी साहब से जला करते थे। उनका ख़याल था कि वह अपने दीन से फिर गये हैं। ऐसा विचित्र जीवन-सिद्धांत उनकी समझ में क्योंकर आता। मुसलमान, सच्चा मुसलमान है तो गंगाजल क्यों पिये, साधुओं का आदर-सत्कार क्यों करे, दुर्गापाठ क्यों करावे? मुल्लाओं में उनके ख़िलाफ़ हंडिया पकती रहती थी और हिन्दुओं को ज़क देने की तैयारियां होती रहती थीं। आख़िर यह राय तय पायी कि ठीक जन्माष्टमी कि दिन ठाकुरद्वारे पर हमला किया जाय और हिन्दुओ का सिर नीचा कर दिया जाय, दिखा दिया जाय कि चौधरी साहब के बल पर फूले-फूले फिरना तुम्हारी भूल है। चौधरी साहब कर ही क्या लेंगे। अगर उन्होंने हिन्दुओं की हिमायत की, तो उनकी भी ख़बर ली जायगी, सारा हिन्दूपन निकल जायगा।

अंधेरी रात थी, कड़े के बड़े ठाकुरद्वारे में कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जा रहा था। एक वृद्ध महात्मा पोपले मुंह से तंबूरो पर ध्रुपद अलाप रहे थे और भक्तजन ढोल-मजीरे लिये बैठे थे कि इनका गाना बंद हो, तो हम अपनी कीर्तन शुरू करें। भंडारी प्रसाद बना रहा था। सैकड़ों आदमी तमाशा देखने के लिए जमा थे।
सहसा मुलसमानों का एक दल लाठियां लिये हुए आ पहुंचा, और मंदिर पर पत्थर बरसाना शुरू किया। शोर मच गया—पत्थर कहां से आते हैं! ये पत्थर कौन फेंक रहा है! कुछ लोग मंदिर के बाहर निकलकर देखने लगे। मुसलमान लोग तो घात में बैठे ही थे, लाठियां जमानी शुरू कीं। हिन्दुओं के हाथ में उस समय ढोल-मंजीरे के सिवा और क्या था। कोई मंदिर में आ छिपा, कोई किसी दूसरी तरफ़ भागा। चारों तरफ़ शोर मच गया।
चौधरी साहब को भी ख़बर हुई। भजनसिंह से बोले—ठाकुर, देखो तो क्या शुर-गुल है? जाकर बदमाशों को समझा दो और न माने तो दो-चार हाथ चला भी देना मगर ख़ून-ख़च्चर न होने पाये।
ठाकुर यह शोर-गुल सुन-सुनकर दांत पीस रहे थे, दिल पर पत्थर की सिल रक्खे बैठे थे। यह आदेश सुना तो मुंहमांगी मुराद पायी। शत्रु-भंजन डंडा कंधे पर रक्खा और लपके हुए मंदिर पहुंचे। वहां मुसलमानों ने घोर उपद्रव मचा रक्खा था। कई आदमियों का पीछा करते हुए मंदिर में घुस गये थे, और शीशे के सामान तोड़-फोड़ रहे थे।
ठाकुर की आंखों में ख़ून उतर आया, सिर पर ख़ून सवार हो गया। ललकारते हुए मंदिर मे घुस गया और बदमाशों को पीटना शुरू किया, एक तरफ़ तो वह अकेला और दूसरी तरफ़ पचासों आदमी! लेकिन वाह रे शेर! अकेले सबके छक्के छुड़ा दिये, कई आदमियों को मार गिराया। ग़ुस्से में उसे इस वक़्त कुछ न सूझता था, किसी के मरने-जीने की परवा न थी। मालूम नहीं, उसमें इतनी शक्ति कहां से आ गयी थी। उसे ऐसा जान पड़ता था कि कोई दैवी शक्ति मेरी मदद कर रही है। कृष्ण भगवान् स्वयं उसकी रक्षा करते हुए मालूम होते थे। धर्म-संग्राम में मनुष्यों से अलौकिक काम हो जाते हैं।
उधर ठाकुर के चले आने के बाद चौधरी साहब को भय हुआ कि कहीं ठाकुर किसी का ख़ून न कर डाले, उसके पीछे ख़ुद भी मंदिर में आ पहुंचे। देखा तो कुहराम मचा हुआ हैं। बदमाश लोग अपनी जान ले-लेकर बेतहाशा भागे जा रहे हैं, कोई पड़ा कराह रहा है, कोई हाय-हाय कर रहा है। ठाकुर को पुकारना ही चाहते थे कि सहसा एक आदमी भागा हुआ आया और उनके सामने आता-आता ज़मीन पर गिर पड़ा। चौधरी साहब ने उसे पहचान लिया और दुनिया आंखों में अंधेरी हो गयी। यह उनका इकलौता दामाद और उनकी जायदाद का वारिस शाहिद हुसेन था!
चौधरी ने दौड़कर शाहिद को संभाला और ज़ोर से बोला—ठाकुर, इधर आओ—लालटेन!….लालटेन! आह, यह तो मेरा शाहिद है!
ठाकुर के हाथ-पांव फूल गये। लालटेन लेकर बाहर निकले। शाहिद हुसैन ही थे। उनका सिर फट गया था और रक्त उछलता हुआ निकल रहा था।
चौधरी ने सिर पीटते हुए कहा—ठाकुर, तुने तो मेरा चिराग़ ही गुल कर दिया।
ठाकुर ने थरथर कांपते हुए कहा—मालिक, भगवान् जानते हैं मैंने पहचाना नहीं।
चौधरी—नहीं, मैं तुम्हारे ऊपर इल्ज़ाम नहीं रखता। भगवान् के मंदिर में किसी को घुसने का अख़्तियार नहीं है। अफ़सोस यही है कि ख़ानदान का निशान मिट गया, और तुम्हारे हाथों! तुमने मेरे लिए हमेशा अपनी जान हथैली पर रक्खी, और ख़ुदा ने तुम्हारे ही हाथों मेरा सत्यानाश करा दिया।
चौधरी साहब रोते जाते थे और ये बातें कहते जाते थे। ठाकुर ग्लानि और पश्चात्ताप से गड़ा जाता था। अगर उसका अपना लड़का मारा गया होता, तो उसे इतना दु:ख न होता। आह! मेरे हाथों मेरे मालिक का सर्वनाश हुआ! जिसके पसीने की जगह वह ख़ून बहाने को तैयार रहता था, जो उसका स्वामी ही नहीं, इष्ट था, जिसके ज़रा-से इशारे पर वह आग में कूद सकता था, उसी के वंश की उसने जड़ काट दी! वह उसकी आस्तीन का सांप निकला! रुंधे हुए कंठ से बोला—सरकार, मुझसे बढ़कर अभागा और कौन होगा। मेरे मुंह में कालिख लग गयी।
यह कहते-कहते ठाकुर ने कमर से छुरा निकाल लिया। वह अपनी छाती में छुरा घोंपकर कालिमा को रक्त से धोना ही चाहते थे कि चौधरी साहब ने लपककर छुरा उनके हाथों से छीन लिया और बोले—क्या करते हो, होश संभालो। ये तक़दीर के करिश्मे हैं, इसमे तुम्हारा कोई क़सूर नहीं, ख़ुदा को जो मंजूर था, वह हुआ। मैं अगर ख़ुद शैतान के बहकावे में आकर मन्दिर में घुसता और देवता की तौहीन करता, और तुम मुझे पहचानकर भी क़त्ल कर देते तो मैं अपना ख़ून माफ कर देता। किसी के दीन की तौहीन करने से बड़ा और कोई गुनाह नहीं हैं। गो इस वक़्त मेरा कलेजा फटा जाता है, और यह सदमा मेरी जान ही लेकर छोड़ेगा, पर ख़ुदा गवाह है कि मुझे तुमसे ज़रा भी मलाल नहीं है। तुम्हारी जगह मैं होता, तो मैं भी यही करता, चाहे मेरे मालिक का बेटा ही क्यों न होता। घरवाले मुझे तानो से छेदेंगे, लड़की रो-रोकर मुझसे ख़ून का बदला मांगेंगी, सारे मुसलान मेरे ख़ून के प्यासे हो जाएंगे, मैं काफ़िर और बेदीन कहा जाऊंगा, शायद कोई दीन का पक्का नौजवान मुझे क़त्ल करने पर भी तैयार हो जाय, लेकिन मै हक़ से मुंह न मोडूंगा। अंधेरी रात है, इसी दम यहां से भाग जाओ, और मेरे इलाक़े में किसी छावनी में छिप जाओ। वह देखो, कई मुसलमान चले आ रहे हैं—मेरे घरवाले भी हैं—भागो, भागो!

साल-भर भजनसिंह चौधरी साहब के इलाक़े में छिपा रहा। एक ओर मुसलमान लोग उसकी टोह में लगे रहते थे, दूसरी ओर पुलिस। लेकिन चौधरी उसे हमेशा छिपाते रहते थे। अपने समाज के ताने सहे, अपने घरवालों का तिरस्कार सहा, पुलिस के वार सहे, मुल्लाओं की धमकियां सहीं, पर भजनसिंह की ख़बर किसी को कानों-कान न होने दी। ऐसे वफ़ादार स्वामिभक्त सेवक को वह जीते जी निर्दयी क़ानून के पंजे में न देना चाहते थे।
उनके इलाक़े की छावनियों में कई बार तलाशियां हुईं, मुल्लाओं ने घर के नौकरों, मामाओं, लौंडियों को मिलाया, लेकिन चौधरी ने ठाकुर को अपने एहसानों की भांति छिपाये रक्खा।
लेकिन ठाकुर को अपने प्राणों की रक्षा के लिए चौधरी साहब को संकट में पड़े देखकर असहय वेदना होती थी। उसके जी में बार-बार आता था, चलकर मालिक से कह दूं—मुझे पुलिस के हवाले कर दीजिए। लेकिन चौधरी साहब बार-बार उसे छिपे रहने की ताक़ीद करते रहते थे।
जाड़ों के दिन थे। चौधरी साहब अपने इलाक़े का दौरा कर रहे थे। अब वह मकान पर बहुत कम रहते थे। घरवालों के शब्द-बाणों से बचने का यही उपाय था। रात को ख़ाना खाकर लेटे ही थे कि भजनसिंह आकर सामने खड़ा हो गया। उसकी सूरत इतनी बदल गई थी कि चौधरी साहब देखकर चौंक पड़े। ठाकुर ने कहा -सरकार अच्छी तरह है?
चौधरी—हां, ख़ुदा का फ़ज़ल है। तुम तो बिल्कुल पहचाने ही नही जाते। इस वक़्त कहां से आ रहे हो?
ठाकुर—मालिक, अब तो छिपकर नहीं रहा जाता। हुक्म हो तो जाकर अदालत में हाज़िर हो जाऊं। जो भाग्य में लिखा होगा, वो होगा। मेरे कारन आपको इतनी हैरानी हो रही है, यह मुझसे नहीं देखा जाता।
चौधरी—नहीं ठाकुर, मेरे जीते जी नही। तुम्हें जान-बूझकर भाड़ के मुंह में नहीं डाल सकता। पुलिस अपनी मर्ज़ी के माफ़िक़ शहादातें बना लेगी, और मुफ़्त में तुम्हें जान से हाथ धोना पड़ेगा। तुमने मेरे लिए बड़े-बड़े ख़तरे सहे हैं। अगर मैं तुम्हारे लिए इतना भी न कर सकूं, तो मुझसे कुछ मत कहना।
ठाकुर—कहीं किसी ने सरकार…
चौधरी—इसका बिल्कुल ग़म न करो। जब तक ख़ुदा को मंजूर न होगा, कोई मेरा बाल भी बांका नहीं कर सकता। तुम अब जाओ, यहां ठहरना ख़तरनाक है।
ठाकुर—सुनता हूं, लोगो ने आपसे मिलना-जुलना छोड़ दिया है
चौधरी—दुश्मनों का दूर रहना ही अच्छा।
लेकिन ठाकुर के दिल में जो बात जम गई थी, वह न निकली। इस मुलाक़ात ने उसका इरादा और भी पक्का कर दिया। इन्हें मेरे कारन यों मारे-मारे फिरना पड़ रहा है। यहां इनका कौन अपना बैठा हुआ? जो चाहे आकर हमला कर सकता है। मेरी इस ज़िंदग़ानी को धिक्कार!
प्रात:काल ठाकुर ज़िला हाकिम के बंगले पर पहुंचा। साहब ने पूछा—तुम अब तक चौधरी के कहने से छिपा था?
ठाकुर—नहीं हज़ूर, अपनी जान के ख़ौफ़ से।

चौधरी साहब ने यह ख़बर सुनी, तो सन्नाटे में आ गए। अब क्या हो? अगर मुक़दमे की पैरवी न की गई तो ठाकुर का बचना मुश्किल है। पैरवी करते है, तो इसलामी दुनिया में तहलका पड़ जाता है। चारों तरफ़ से फ़तवे निकलने लगेंगे। उधर मुसलमानों ने ठान ली कि इसे फांसी दिलाकर ही छोड़ेंगे। आपस में चंदा किया गया। मुल्लाओं ने मसजिद में चंदे की अपील की, द्वार-द्वार झोली बांधकर घूमे। इस पर क़ौमी मुक़दमे का रंग चढ़ाया गया। मुसलमान वकीलों को नाम लूटने का मौक़ा मिला। आसपास के ज़िलों के लोग जिहाद में शरीक होने के लिए आने लगे।
चौधरी साहब ने भी पैरवी करने का निश्चय किया, चाहे कितनी ही आफ़तें क्यों न सिर पर आ पड़े। ठाकुर उन्हें इंसाफ़ की निगाह में बेक़सूर मालूम होता था और बेक़सूर की रक्षा करने में उन्हें किसी का ख़ौफ़ न था, घर से निकल खड़े हुए और शहर में जाकर डेरा जमा लिया।
छ: महीने तक चौधरी साहब ने जान लड़ाकर मुक़दमे की पैरवी की। पानी की तरह रुपये बहाये, आंधी की तरह दौड़े। वह सब किया जो ज़िन्दगी में कभी न किया था, और न पीछे कभी किया। अहलकारों की ख़ुशामदें कीं, वकीलों के नाज़ उठाये, हकिमों को नज़रें दीं और ठाकुर को छुड़ा लिया। सारे इलाक़े में धूम मच गई। जिसने सुना, दंग रह गया। इसे कहते हैं शराफ़त! अपने नौकर को फांसी से उतार लिया।
लेकिन साम्प्रदायिक द्वेष ने इस सत्कार्य को और ही आंखों से देखा—मुसलमान झल्लाये, हिन्दुओं ने बगलें बजाईं। मुसलमान समझे इनकी रही-सही मुसलमानी भी गायब हो गई। हिन्दुओ ने ख़याल किया, अब इनकी शुद्धि कर लेनी चाहिए, इसका मौक़ा आ गया। मुल्लाओं ने ज़ोर-ज़ोर से तबलीग की हांक लगानी शुरू की, हिन्दुओ ने भी संगठन का झंडा उठाया। मुसलमानों की मुलसमानी जाग उठी और हिन्दुओ का हिन्दुत्व। ठाकुर के क़दम भी इस रेले में उखड़ गये। मनचले थे ही, हिन्दुओं के मुखिया बन बैठे। ज़िन्दगी मे कभी एक लोटा जल तक शिव को न चढ़ाया था, अब देवी-देवताओं के नाम पर लठ चलाने के लिए उद्यत हो गए। शुद्धि करने को कोई मुसलमान न मिला, तो दो-एक चमारो ही की शुद्धि करा डाली। चौधरी साहब के दूसरे नौकरों पर भी असर पड़ा; जो मुसलमान कभी मसजिद के सामने खड़े न होते थे, वे पांचों वक़्त की नमाज़ अदा करने लगे, जो हिन्दू कभी मन्दिरों में झांकते न थे, वे दोनों वक़्त सन्ध्या करने लगे।
बस्ती में हिन्दुओं की संख्या अधिक थी। उस पर ठाकुर भजनसिंह बने उनके मुखिया, जिनकी लाठी का लोह सब मानते थे। पहले मुसलमान, संख्या में कम होने पर भी, उन पर ग़ालिब रहते थे, क्योंकि वे संगठित न थे, लेकिन अब वे संगठित हो गये थे, मुट्ठी-भर मुसलमान उनके सामने क्या ठहरते।
एक साल और गुज़र गया। फिर जन्माष्टमी का उत्सव आया। हिन्दुओ को अभी तक अपनी हार भूली न थी। गुप्त रूप से बराबर तैयारियां होती रहती थी। आज प्रात:काल ही से भक्त लोग मन्दिर में जमा होने लगे। सबके हाथों में लाठियां थीं, कितने ही आदमियों ने कमर में छुरे छिपा लिए थे। छेड़कर लड़ने की राय पक्की हो गई थी। पहले कभी इस उत्सव में जुलूस न निकला था। आज धूम-धाम से जुलूस भी निकलने की ठहरी।
दीपक जल चुके थे। मसजिदों में शाम की नमाज़ होने लगी थी। जुलूस निकला। हाथी, घोड़े, झंडे-झंडियां, बाज़े-गाजे, सब साथ थे। आगे-आगे भजनसिंह अपने अखाड़े के पट्ठों को लिए अकड़ते चले जाते थे।
जामा मसजिद सामने दिखाई दी। पट्ठों ने लाठियां संभालीं, सब लोग सतर्क हो गये। जो लोग इधर-उधर बिखरे हुए थे, आकर सिमट गये। आपस में कुछ काना-फूसी हुई। बाज़े और ज़ोर से बजने लगगे। जयजयकार की ध्वनि और ज़ोर से उठने लगी। जुलूस मसजिद के सामने आ पहुंचा।
सहसा एक मुसलमान ने मसजिद से निकलकर कहा—नमाज़ का वक़्त है, बाज़े बन्द कर दो।
भजनसिंह—बाज़े न बन्द होंगे।
मुसलमान—बन्द करने पड़ेंगे।
भजनसिंह—तुम अपनी नमाज़ क्यों नहीं बन्द कर देते?
मुसलमान—चौधरी साहब के बल पर मत फूलना। अबकी होश ठंडे हो जायेंगे।
भजनसिंह—चौधरी साहब के बल पर तुम फूलो, यहां अपने ही बल का भरोसा हैं यह धर्म का मामला है।
इतने में कुछ और मुसलमान निकल आए, और बाज़े बन्द करने का आग्रह करने लगे, इधर और ज़ोर से बाज़े बजने लगे। बात बढ़ गई। एक मौलवी ने भजनसिंह को काफ़िर कह दिया। ठाकुर ने उसकी दाढ़ी पकड़ ली। फिर क्या था। सूरमा लोग निकल पड़े, मार-पीट शुरू हो गई। ठाकुर हल्ला मारकर मसजिद में घुस गये, और मसजिद के अन्दर मार-पीट होने लगी। यह नहीं कहा जा सकता कि मैदान किसके हाथ रहा। हिन्दू कहते थे, हमने खदेड़-खदेड़कर मारा, मुसलमान कहते थे, हमने वह मार मारी कि फिर सामने नहीं आएंगे। पर इन विवादों की बीच में एक बात मानते थे, और वह थी ठाकुर भजनसिंह की अलौकिक वीरता। मुसलमानों का कहना था कि ठाकुर न होता तो हम किसी को ज़िन्दा न छोड़ते। हिन्दू कहते थे कि ठाकुर सचमुच महावीर का अवतार है। इसकी लाठियों ने उन सबों के छक्के छुड़ा दिए।
उत्सव समाप्त हो चुका था। चौधरी साहब दीवानखाने में बैठे हुए हुक़्क़ा पी रहे थे। उनका मुख लाल था, त्यौंरिया चढ़ी हुईं थी, और आंखों से चिनगारियां-सी निकल रहीं थीं। ‘ख़ुदा का घर’ नापाक किया गया। यह ख़याल रह-रहकर उनके कलेजे को मसोसता था।
ख़ुदा का घर नापाक किया गया! ज़ालिमों को लड़ने के लिए क्या नीचे मैदान में जगह न थी! ख़ुदा के पाक घर में यह ख़ून-ख़च्चर! मसजिद की यह बेहुरमती! मन्दिर भी ख़ुदा का घर है और मसजिद भी। मुसलमान किसी मन्दिर को नापाक करने के लिए सज़ा के लायक है, क्या हिन्दू मसजिद को नापाक करने के लिए उसी सज़ा के लायक नहीं?
और यह हरकत ठाकुर ने की! इसी क़सूर के लिए तो उसने मेरे दामाद को क़त्ल किया। मुझे मालूम होता कि उसके हाथों ऐसा फल होगा, तो उसे फांसी पर चढ़ने देता। क्यों उसके लिए इतना हैरान, इतना बदनाम, इतना ज़ेरबार होता। ठाकुर मेरा वफ़ादार नौकर है। उसने बारहा मेरी जान बचाई है। मेरे पसीने की जगह ख़ून बहाने को तैयार रहता है। लेकिन आज उसने ख़ुदा के घर को नापाक किया है, और उसे इसकी सज़ा मिलनी चाहिए। इसकी सज़ा क्या है? जहन्नुम! जहन्नुम की आग के सिवा इसकी और कोई सज़ा नहीं है। जिसने ख़ुदा के घर को नापाक किया, उसने ख़ुदा की तौहीन की। ख़ुदा की तौहीन!
सहसा ठाकुर भजनसिंह आकर खड़े हो गए।
चौधरी साहब ने ठाकुर को क्रोधोन्मत्त आंखों से देखकर कहा—तुम मसजिद में घुसे थे?
भजनसिंह—सरकार, मौलवी लोग हम लोगों पर टूट पड़े।
चौधरी—मेरी बात का जवाब दो जी – तुम मसजिद में घुसे थे?
भजनसिंह—जब उन लोगों ने मसजिद के भीतर से हमारे ऊपर पत्थर फेंकना शुरू किया तब हम लोग उन्हें पकड़ने के लिए मसजिद में घुस गए।
चौधरी—जानते हो मसजिद ख़ुदा का घर है?
भजनसिंह—जानता हूँ हुज़ूर, क्या इतना भी नहीं जानता।
चौधरी—मसजिद ख़ुदा का वैसा ही पाक घर है, जैसे मंदिर।
भजनसिंह ने इसका कुछ जवाब न दिया।
चौधरी—अगर कोई मुसलमान मन्दिर को नापाक करने के लिए गर्दनजदनी है तो हिन्दू भी मसजिद को नापाक करने के लिए गर्दनजदनी है।
भजनसिंह इसका भी कुछ जवाब न दे सका। उसने चौधरी साहब को कभी इतने ग़ुस्से में न देखा था।
चौधरी—तुमने मेरे दामाद को क़त्ल किया, और मैंने तुम्हारी पैरवी की। जानते हो क्यों? इसलिए कि मै अपने दामाद को उस सज़ा के लायक समझता था जो तुमने उसे दी। अगर तुमने मेरे बेटे को, या मुझी को उस क़सूर के लिए मार डाला होता तो मैं तुमसे ख़ून का बदला न मांगता। वही क़सूर आज तुमने किया है। अगर किसी मुसलमान ने मसजिद में तुम्हें जहन्नुम में पहुंचा दिया होता तो मुझे सच्ची ख़ुशी होती। लेकिन तुम बेहयाओं की तरह वहां से बचकर निकल आये। क्या तुम समझते हो ख़ुदा तुम्हें इस फल की सज़ा न देगा? ख़ुदा का हुक्म है कि जो उसकी तौहीन करे, उसकी गर्दन मार देनी चाहिए। यह हर एक मुसलमान का फ़र्ज़ है। चोर अगर सज़ा न पावे तो क्या वह चोर नहीं है? तुम मानते हो या नहीं कि तुमने ख़ुदा की तौहीन की?
ठाकुर इस अपराध से इनकार न कर सके। चौधरी साहब के सत्संग ने हठधर्मी को दूर कर दिया था। बोले—हां साहब, यह क़सूर तो हो गया।
चौधरी—इसकी जो सज़ा तुम दे चुके हो, वह सजा ख़ुद लेने के लिए तैयार हो?
ठाकुर—मैंने जान-बूझकर तो दूल्हा मियां को नहीं मारा था।
चौधरी—तुमने न मारा होता, तो मैं अपने हाथों से मारता, समझ गए! अब मैं तुमसे ख़ुदा की तौहीन का बदला लूंगा। बोलो, मेरे हाथों चाहते हो या अदालत के हाथों। अदालत से कुछ दिनों के लिए सज़ा पा जाओंगे। मैं क़त्ल करूंगा। तुम मेरे दोस्त हो, मुझे तुमसे मुतलक़ कीना नहीं है। मेरे दिल को कितना रंज है, यह ख़ुदा के सिवा और कोई नहीं जान सकता। लेकिन मैं तुम्हें क़त्ल करूंगा। मेरे दीन का यह हुक्म है।
यह कहते हुए चौधरी साहब तलवार लेकर ठाकुर के सामने खड़े हो गये। विचित्र दृश्य था। एक बूढा आदमी, सिर के बाल पके, कमर झुकी, तलवार लिए एक देव के सामने खड़ा था। ठाकुर लाठी के एक ही वार से उनका काम तमाम कर सकता था। लेकिन उसने सिर झुका दिया। चौधरी के प्रति उसके रोम-रोम में श्रद्धा थी। चौधरी साहब अपने दीन के इतने पक्के हैं, इसकी उसने कभी कल्पना तक न की थी। उसे शायद धोखा हो गया था कि यह दिल से हिन्दू हैं। जिस स्वामी ने उसे फांसी से उतार लिया, उसके प्रति हिंसा या प्रतिकार का भाव उसके मन में क्यों कर आता? वह दिलेर था, और दिलेरों की भांति निष्कपट था। उसे इस समय क्रोध न था, पश्चात्ताप था। दीन कहता था—मारो। सज्जनता कहती थी—छोड़ो। दीन और धर्म में संघर्ष हो रहा था।
ठाकुर ने चौधरी का असमंजस देखा। गदगद कंठ से बोला—मालिक, आपकी दया मुझ पर हाथ न उठाने देगी। अपने पाले हुए सेवक को आप मार नहीं सकते। लेकिन यह सिर आपका है, आपने इसे बचाया था, आप इसे ले सकते हैं, यह मेरे पास आपकी अमानत थी। वह अमानत आपको मिल जाएगी। सबेरे मेरे घर किसी को भेजकर मंगवा लीजिएगा। यहां दूंगा, तो उपद्रव खड़ा हो जाएगा। घर पर कौन जायेगा, किसने मारा। जो भूल-चूक हुई हो, क्षमा कीजिएगा।
यह कहता हुआ ठाकुर वहां से चला गया।

By |2019-04-29T15:41:21+05:30April 29th, 2019|Hindi Stories, Premchand's Other Stories, Stories of Premchand|0 Comments

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